मध्य रात्रि और मैं
मध्य रात को नींद खुली तब
आँखें खिड़की पर झूल गयीं
जब खिड़की से चाँद दिखा तो
मन में बिजली सी कौंध गयीं
कमरे में बड़ा अंधेरा था
पर महताबी बर्षा से चकाचौंध भयीं
सायद याद किया था किसी ने इस पल
चाँद सितारों के संग बातें अनमोल भयीं
वह खिड़की का खुलना
आँखों से नींद मचलना
वह अंधेरे कमरे में भी
चाँद का आकर गजब टहलना
यह सब कुछ तो संदेशा लायीं थी
तब तो धवलित चाँद ने आकर
चुपके से नींद चुराई थी
सायद कल अमावस आने वाली है
इस कारण मुझसे मिलने आयी थी
चाँद के संग संग तारे भी थे
चाँदी का रंग पिये वह उजयारे भी थे
धवलित चादर ओढ़े
खड़ी हुई थी प्रकृति जहाँ गुमसुम सी
ऐसे अजब गजब प्रकाशित गलियारे भी थे
शीतलता में दहक जगा दे
ऐसे कुछ अंगारे भी थे
अंगारों को भी हिम खण्ड बना दे
ऐसे गजब नजारे भी थे
दुर्गेश कुमार सराठे
30/03/18
9:24
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