मैं कविता क्यों लिखता हूँ
जब जिव्हा मौन औढ़ लेती है
वाणी भी कुछ न कहती है
धड़कन स्थिर सी हो जाती है
मन की गति सिथिल न हो पाती है
तब विचारों की धारा एक निकल
कलम से कागज तक आती है
स्वतः कविता लिख जाती है
मन के सागर में कभी
भावों का ज्वार उछलता है
देख धरा की बंदिश को
मन पंछी बढ़ा मचलता है
जब आसमान छूने की इच्छा
कभी न जाहिर हो पाती है
तब कलम स्वतः आगे आकर
कागज से मिलने को अतुराती है
और आगे चलकर कविता हो जाती है
सबके होने पर भी मैं स्वयं को
कभी अकेला जब पाता हूँ
तब मन में बैचेनी उठती है
जब इसको सह न पाता हूँ
सब कुछ कहने की इच्छा होती है
पर कुछ कह न पाता हूँ
तब मेरी प्रवक्ता बनकर
कलम कागज पर आती है
और आगे चलकर कविता हो जाती है
दुर्गेश कुमार सराठे
Comments
Post a Comment