प्रतःकाल
प्रतः काल का देख नजारा
आँखों में हर्ष तनिक न आया
सूरज की लालिमा को भी
मेरा मन कुछ समझ न पाया
ओस की बूँदे श्वेत मकोड़ो सी
पौधों की डाली पर ऐंठी है
प्रकृति आज लगत है
मौन औढ़ कर बैठी है
पंछी की कलरव करती वाणी
न हृदय को अब भाति है
मंद पवन भी मधुर हिलोरे
न अंदर तक ला पाती हैं
सूर्य सुबह का तपते लोहे सा है
मानों ज्वालामुखी से वायु निकाल ले आती है
हृदय के अंदर की खामोशी
बाहर व्यापे सन्नाटे से कुछ कहती है
प्रकृति आज लगत है
मौन औढ़ कर बैठी है
न जल की बूँदे मोती लगती है
न ताल तल्लइयों का जल कुछ कहता है
नदियाँ जैंसे शोर मचाती
कोयल भी हकलाती है
केश कामिनी के नागिन से हैं
जो डसने को अतुराती है
जीवन नाव चढ़न को वाणी
चह से कुछ न कह पाती है
प्रकृति आज लगत है
मौन औढ़ कर बैठी है
दुर्गेश कुमार सराठे
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