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कविता

जिसके कंधे पर सर रख पाते अपने हृदय की व्यथा सुनाते ऐसा कोई अपना भी तो होता जिसको हम अपना कह पाते जिससे होती मीठी मीठी बाते जिसकी  यादों में  कटती रातें जिससे  कभी  झगड़ भी प...

कविता

कुछ तो कहती रहो, वायु सी नित बहती रहो| नदियों के जल की कल कल, बसंत  ऋतु के गुंजित पल| पंछी के कलरव का शोर, कभी पपीहा और चकोर| बन हृदय की श्वास, कभी तो फिर से लौटो| यूँ मौन औढ़ ना बैठो| स...

कविता

अपने मन की बात जतन से बहुत झिझक कर कहता है कुछ रुकता है कुछ झुकता है यूँ रुकता रुकता बहता है बात बंद है, जबसे तुम से.. मन दुखता दुखता रहता है लगता सारे बंध टूट गए कवि के सारे छंद र...

कविता

मेरे मन मैं चिंतित हूँ कुछ समस्याओं से थोड़ा चिड़ा भी हूँ तुमसे शिकायतें भी बहुत हैं पर तुमसे कुछ नहीं कहूँगा बैंसे तुम्हे पता तो है मेरा स्वभाव... बैंसे भी हम एक ही यात्रा क...

तुम साथ होते तो

तुम साथ होते तो, सफर बातों बातों में कट जाता| यूँ दुख से आहत ना होता.., थोड़ा थोड़ा बट जाता| भले अंधेरे में चलते, पर पुंज हृदय में पट जाता| अरे रात को चलने देते, सुबह अंधेरा छट जाता| मेरे मन तुम ना भागे होते, मैं पावक में डट जाता| अरे तनिक रुक तो जाते, स्वयं लुटेरा हट जाता| हृदय में यूँ दंस ना होते, पीयूष हृदय में रट जाता| गरल अगर मैं पी जाता, सबकुछ वहीं सिमट जाता| ना फिर तुम वागी होते, रुदन तुम्हारा घट जाता| दुर्गेश कुमार सराठे

कविता

किसको अपनी व्यथा बतायें? किससे कह दें दिल का रोना? भर  भादों  सा  टपक रहा है, मन की छत का कोना कोना| लैकिन फिर भी सीख चुका हूँ, विचलित नहीं मुझे अब होना| पर्वत   पर्वत   पीर   शिख...

कविता

मन चिंतित था पर चिंता... कोई तीव्र नहीं.. वह तो एक.. तृण तंतु सम एक झकोरे से.. उड़ जाती है| मन के क्षितिज में| जब कभी... चिंता उतर जाती है| हृदयतल के तीव्र भंवर में.. लगता है| कोई नदी सूख गई.. ...