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दोहे

कुकुरा उस पल भौंकते,गिरे गर्त में शेर कमजोरी  में  घेरते,फिरे समय का फेर!!१!! अबसर पाय वज़ीर को,प्यादा देत गिराय गज को ऊँट पसार दे,राजा सहित हिराय!!२!! गर्दभ कुत्ता भेड़िया जब, मि...

सहपाठी

मेरे एक मित्र ने कहा,पहले सेमेस्टर में हम सबको जान पाते हैं। फिर बात चीत शुरू होती है..। फिर सब घुलमिल जाते हैं...। मतलब दोस्त बन जाते हैं। तब मैंने कहा...., हां। कुछ हद तक ठीक है,किन्तु पहले सेमेस्टर में हम इंसानों और ढोरों में अंतर करना सीख पाते हैं..।द्वितीय सेमेस्टर तक झुण्ड बन जाते हैं। कोई झुण्ड शियारों का होता है,तब कोई शेरों का होता है। कई बार तो गठबंधन की अजीब परम्परा दृष्टव्य होती है।समन्वयवादिता का अनुपम प्रयोग दिखाई देता है। जब लोमड़ी और सुअर गधों आदि का झुण्ड मिलकर सरकार बना लेता है। बेचारा शेर अपनी सरकार चलाने के लिए कमजोर व लाचार सा नजर आता है। भांति-भांति के झुण्ड नियंत्रक पैदा हो जाते है,अब जब झुण्ड निमार्णक प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है,तब कुछ कमजोर व अलगाववादी बचते है। वह भी अपने अधिकारों के वर्चस्व के लिए किसी झुण्ड में शामिल होना चाहते हैं,पर उन्हें इतनी आसानी से कोई झुण्ड अपनी सदस्यता नहीं देता...। बेचारे लाचार से मुँह लटकाय इधर-उधर घूमते रहते हैं। वहीं अब नम्बर आता है,चमचों का। चमचे प्रत्येक झुण्ड के गुप्त सदस्य होते हैं और कुत्ते होने का पूर्णपरिचय प्रस्तुत करते है...

कविता

*आज चिड़ा फिर मन है* आज      चिड़ा    सा  मन है न     जाने    क्या उलझन है ना.  सुनता   हूँ ना  कहता हूँ हरदम  डरा डरा सा रहता हूँ खामोशी की कैंसी तड़पन है आज     चिड़ा    फिर मन ...

मध्य रात्रि और मैं

मध्य रात को नींद खुली तब आँखें खिड़की पर झूल गयीं जब खिड़की से चाँद दिखा तो मन में बिजली सी कौंध गयीं कमरे में बड़ा अंधेरा था पर महताबी बर्षा से चकाचौंध भयीं सायद याद किया थ...

जब सब कुछ छोड़ चला जाऊंगा

जब वाणी मौन औढ़ लेगी जिह्वा हिल ना पायेगी उर की धड़कन मद्धम होगी सांसो की बेल उखड़ जायेगी जीवन मुझे थका देगा तब मृत्यु माँ मुझे सुलाने आयेगी फिर क्या मुझे कोई याद करेगा जब ...

दिखावा

वाट्सएप फेसबुक पर ,देखो आजकल| हंस का चोला पहने ,आये छलैया| जित देखो उत,वाट्सएप पर डीपी| मेरे पापा, मेरा दोस्त, मेरी मैया| छोटा सा काम ,किया न हो दोस्त का, वे पीटत याराना ढोल,नाटच ता...

मैं कविता क्यों लिखता हूँ

जब जिव्हा मौन औढ़ लेती है वाणी भी कुछ न कहती है धड़कन स्थिर सी हो जाती है मन की गति सिथिल न हो पाती है तब विचारों की धारा एक निकल कलम से कागज तक आती है स्वतः कविता लिख जाती है मन ...