कविता
*आज चिड़ा फिर मन है*
आज चिड़ा सा मन है
न जाने क्या उलझन है
ना. सुनता हूँ ना कहता हूँ
हरदम डरा डरा सा रहता हूँ
खामोशी की कैंसी तड़पन है
आज चिड़ा फिर मन है
कुछ इच्छायें झुलझीं
कुछ सपने विखर गए
देख घटा काले तम की
ओजस के गुण मुकर गए
अटक गया हूँ दो राहे पर
कैंसी यह अटकन है
आज चिड़ा फिर मन है
किन बंधों से बंधा हुआ हूँ
कोई इससे मुक्त करे
नये बंधो को पुनः बनाये
उनमें फिर आसक्त करे
सब जाने क्यों रूखापन है
आज चिड़ा फिर मन है
कोई तपते बैसाखी मन में
श्रावण की पुरवाई लाये
लू के इस भीषण मौसम में
कोई तो मधु मधुराई लाये
क्या सब में अपनापन है
आज चिड़ा फिर मन है
दुर्गेश कुमार सराठे
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