दोहे
कुकुरा उस पल भौंकते,गिरे गर्त में शेर
कमजोरी में घेरते,फिरे समय का फेर!!१!!
अबसर पाय वज़ीर को,प्यादा देत गिराय
गज को ऊँट पसार दे,राजा सहित हिराय!!२!!
गर्दभ कुत्ता भेड़िया जब, मिले एक इंसान
वही जगत में साधु है, कहता जगत महान!!३!!
लिखने बैठा आज जब, गीतों में श्रृंगार
पता नहीं कब हिय घुसा,दावानल का ज्वार!!४!!
जम्बुक शेर सियार गिद्ध,भके न शाकाहार
बैंसे दुर्जन आदमी, तजे ना मिथ्याचार!!५!!
कितना दूध पिलाइये,जहर ही उगले नाग
दुर्जन ना निर्मल हुआ,बरे कपट की आग!!६!!
सूखी नदिया देखकर, मन में आई बात
कंकड़ पत्थर खेलती,जीवन की सौगात!!७!!
नीर वाहिनी लग रही, रेतवाहिनी आज
बालू तल में वह रही,जल ढूंढत मृगराज!!८!!
सूखा तरु भी कह उठा,उड़ते खग के प्रान
मानव अब तो चेत जा,बना ना सब सम्सान!!९!!
राजनीति परिवार में,बड़े गजब इंसान
गुण हैं पूरे जंगली,बाहर दिखे महान!!११!!
सुअर कहा अब बोलते,मैला मुख लपटाय
बड़े गटर के जीव को,नदिया नहीं सुहाय!!१२!!
प्रतीभा रुकती नहीं, करें ना मिथ्या रोष
सब तो आज तुरंग हैं,गधा तो दृष्टि दोष!!१३!!
सुअर चाल की सिद्धता,कर दी हमने आज
झूठ मूठ चलने लगे ,देख पदों की गाज!!१४!!
सक्ल तक नहीं जानते,अपना पन जतलाय
सबरे मेढक के जैंसे, नमी देख टरराय!!१५!!
अब भी नहीं सुधर सके,चुखरा रहे चलाय
आंखे भी है धूंधरी,दिन में रात दिखाय!!१६!!
चन्द्रमरीचि देखकर, नयन बहुत इतराय
निशा विचारी रो पड़़ी, मोय देत निपटाय!!१७!!
तिमिर निशा का सब घटा,सूखे तम के पात
शशि तल में आत ही, रोय विचारी रात!!१८!!
चाँद ने भेदा बक्ष अब,रुदन करे तम मंच
वामा भूली रागनी, अमला कर प्रपंच!!१९!!
यामिनी अब निऋति हुई,गिरा सोम प्रपात
तारापति घुस रात में, शशि सरि करे उत्पात!!२०!!
गिरते सूखे पात सम,गिरी नयन की लाज
मर्यादा भी नष्ट हुई,शर्म कहाँ अब आज!!२१!!
यह जग काला नाग है,विषधर सब इंसान
मारे विष की फूकनी, वांचे बुढ़ियाज्ञान!!२२!!
चाँद उगलती आगनी,निशा आग बरसाय|
ग्रीष्म इत प्रचण्ड है,आगी बादल छाय||२३!!
धरती तपती लौह सम,सूरज तप तप जाय|
पवन भी छाया माँगती,सज़र बाँह फैलाय||२४!!
नदिया बालू ढेर भइ,सूखा पूरा नीर|
पंछी जल को ढूंढते,मछली हुई अधीर||२५!!
छाया छाया मांगती,शीतल जल को ताल|
दिबस तपन में रो रहा,निशा हुई बेहाल||२६!!
घर अंधेरा देखकर ,नयन गए चकराय|
हृदय में जब तिमिर भरा,कहाँ प्रभाति आय||२७!!
कौन यहाँ पर है बुरा,उनसे सब अनजान
सब अपना परिवार है,यहाँ नहीं मेहमान!!२८!!
कौन क्या है लिख रहा,किसका क्या संदेश
तनिक नाम लिख भेजिए, समझ सके दुर्गेश!!२९!!
सब हमें कचनार लगे,जहर युक्त से फूल
समय का उल्टा खेल था,या हमने की भूल!!३०!!
आज सभी तो पास है,लैकिन फिर भी दूर
वन के सूखे पेड़ भी ,दिखे अहम में चूर!!३१!!
कांटे बिष ओ सर्पणी, हमें दिखे थे हार
लैकिन जब उर में धसे,दिखा असल संसार!!३२!!
कर्कश वाणी कर रही,मृदुलता में बात
ओढ़ी खाल सियार ने,रहे नीच की जात!!३३!!
कोयल भाषा बोलते,कौआ चढ़त बबूल
श्यामा हकलाती भिरे,पड़ी समय की धूल!!३४!!
रंग दोनों के एक से,रहे गुणों में फेर
एक मृदुलता से भरी,भरी नीचता ढेर!!३५!!
वगुले अब भरने लगे,शिखरों तक कि उड़ान
हंस समझ मोहित हुये,देख झील के प्रान!!३६!!
नागफनी फलने लगी,केशर और पलास
सूरज भी अब ढूंढता,तम में घोर उजास!!३७!!
मोर साँप ओ शेर गउ,कैंसे करे मिलान
घात लगाना काम है,झूठे हम इंसान!!३८!!
गिद्ध गिलहरी लोमड़ी,संग भेड़िया साब
दानव भी देवा लगे,पहने देख नक़ाब!!३९!!
गीधड़ बंदर नेवला,बनकर आये यार
राह रोकने सिंह की,करते जालाचार!!४०!!
अकड़ू भुकड़ू ना बनो,बनो ना गुस्सेदार
सबके सब इक दिन गये,दोनों हाथ पसार!!४१!!
सत्य बेंच झूठा गहे,किया झूठ का जाप
सत्य का जब दृश्य दिखे,तब तब होय विलाप!!४२!!
अकड़ मुर्दे में होत है,जीवित नर में लोच
फलते पेड़ों सम झुके,रहे नमी की सोच!!४३!!
दोस्त मित्र होते नहीं, होय न कोई यार
दुनिया सारी मतलबी,छल के सबरे जार!!४४!!
सुअर गधों गज बाज का,कैंसे हो विश्वास
एक मुहँ में दो जीभ हैं,करते सब वकवास!!४५!!
बगुले अब करने चले,राम नाम का जाप
भूतों के चरणन गिरे, घर में बैठा बाप!!४६!!
झूठ दिखावा जे करत,रचें झूठ के खैल
भीतर केरोसीन हैं,बाहर चिकने तेल!!४७!!
पहन के चोला देव का,निकले अब असुरेश
जहर बुझे यह तीर हैं,दिखते काले केश!!४८!!
नाम रखा मोहित जगत,नहीं मोह औ प्रीत
शेरसींग गीधड़ बने, जग की औंधी रीत!!४९!!
शेर बेर चुगने चले, चर जंगल की घास
कौये मृदुभाषी हुये, यह कैंसा परिहास!!५०!!
बाप तो सबका एक है,बेटे हो गए चार
छल कपट तृष्णा द्वेष की,खींच रहे तलवार!!५१!!
बाप तो सबका एक ही,माँ हैं लैकिन चार
दम्भीता के दम्भ में ,गुमा बाप का प्यार!!५२!!
Comments
Post a Comment