सहपाठी
मेरे एक मित्र ने कहा,पहले सेमेस्टर में हम सबको जान पाते हैं। फिर बात चीत शुरू होती है..। फिर सब घुलमिल जाते हैं...। मतलब दोस्त बन जाते हैं। तब मैंने कहा...., हां। कुछ हद तक ठीक है,किन्तु पहले सेमेस्टर में हम इंसानों और ढोरों में अंतर करना सीख पाते हैं..।द्वितीय सेमेस्टर तक झुण्ड बन जाते हैं। कोई झुण्ड शियारों का होता है,तब कोई शेरों का होता है। कई बार तो गठबंधन की अजीब परम्परा दृष्टव्य होती है।समन्वयवादिता का अनुपम प्रयोग दिखाई देता है। जब लोमड़ी और सुअर गधों आदि का झुण्ड मिलकर सरकार बना लेता है। बेचारा शेर अपनी सरकार चलाने के लिए कमजोर व लाचार सा नजर आता है। भांति-भांति के झुण्ड नियंत्रक पैदा हो जाते है,अब जब झुण्ड निमार्णक प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है,तब कुछ कमजोर व अलगाववादी बचते है। वह भी अपने अधिकारों के वर्चस्व के लिए किसी झुण्ड में शामिल होना चाहते हैं,पर उन्हें इतनी आसानी से कोई झुण्ड अपनी सदस्यता नहीं देता...। बेचारे लाचार से मुँह लटकाय इधर-उधर घूमते रहते हैं। वहीं अब नम्बर आता है,चमचों का। चमचे प्रत्येक झुण्ड के गुप्त सदस्य होते हैं और कुत्ते होने का पूर्णपरिचय प्रस्तुत करते है...