तड़पती मछली
आज शाम चार बजे में संस्थान से घर आ रहा था, तब मेरे साथ एक अजीब घटना घटी| हुआ यूँ कि जब मैं संस्थान से निकला तब मेरे साथ मेरे दो मित्र आशुतोष आचार्य व ऋषि अग्रवाल थे,ऋषि भाई एस आर फोर से निकल गए,बचे हम दोनों हमें एस. आर. ऐट. से जाना होता है जिसके आने में अभी समय था| मैंने आशु भाई से कहा चलो पहले चाय पीते हैं| फिर चलेंगे| हम दोनों ने चाय पीई, और बस स्टाप पर आ गये| वहाँ हमें तरूण भाई मिल गए,जो हमारे पास की कॉलोनी में ही रहते हैं|
इतने में बस आ गई आशुभाई उनके स्टाप पर उतर गए|
मैं और तरूण ग्यारह सौ आवास उतरे यहाँ से हमें टी.आर.बन पकड़नी थी| तब हम अपने बस स्टाप पर आ कर बैठ गये| हमारे सामने से दो बसें निकल गईं| दोनों ही नहीं रूकीं,अब करते भी क्या दोनों वहीं बैठकर बाते करने लगे सोचा जब बस आयेगी तो चलेंगे| तभी तरूण भाई की नजर अचानक सड़क पर पड़ी एक मछली पर पड़ गई| और तरूण भाई चौंककर बोले दुर्गेश भाई मछली,हम चौंक पड़े की सड़क पर मछली क्या माजरा है? मैंने तरूण भाई से पूछा कहाँ है भाई? उन्होंने अपने हाथ का इसारा करते हुए कहा वहाँ पर...,तब मैं क्या देखता हूँ कि वह मछली तड़फड़ा रही है| पानी से विरक्त होने के कारण तड़प रही है| मैं उसके नजदीक गया| अब हमारे भीतर एक हिन्दुत्ववादी व्यक्ति जाग उठा,जिसने आज से पहले कभी मछली को छुआ तक नहीं है|मेरे मन में ख्याल आया कि यह तो अपवित्र मछली है,और हम पूजा पाठ करने वाले इंसान हैं| इसका स्पर्श भी हमारे लिये निषेध है,और ऊपर से आज महाशिवरात्री का पावन पर्व व मंगलवार का पवित्र दिन है| किन्तु मछली की तड़पन देखकर हमारा हृदय रो पड़ा| हमने मन की एक न सुनी,मेरी हिन्दूवादिता कहीं कोने में जा बैठी| हमारी आत्मा ने मन को फटकार लगा दी, कि किसी की जान बचाने से बढ़ा कार्य कुछ नहीं है|
चाहे वह पुण्य आत्मा हो या पापात्मा| मैंने अपनी की आवाज़ को पहचान लिया| हमने सोचा अपवित्र है तो क्या हुआ,है तो एक जीवित प्राणी| और गीता में भी श्रीकृष्ण भी तो यही कहते हैं कि मैं समस्त जीवों में अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान हूँ| तब जरूर इस मछली के भीतर भी वही परमात्मा जरूर विराजमान है| मैंने उस मछली के भीतर भी उसी भगवान को बैठा मानकर उसे अपने हाथों से उठाने का प्रयास किया,पर जिसे किसी से इतनी घृणा हो,और उसे वही बस्तु दे दी जाये| तब आप समझ ही सकते हैं क्या हुआ होगा हमारे भीतर..
फिर भी हमनें उसे अपने हाथों में उठाया लैकिन जैंसे ही उसे अपने हाथों में उठाया हमारा पूरा शरीर काँप उठा|
एक अजीब सी हलचल हमारे शरीर में पैदा हो गई|यह मेरे जीवन का पहला दृश्य है,जिसमें मैंने पहली बार मछली को अपने हाथों से स्पर्श किया, उसे उठाया|
यह अपने आप में अद्वितीय था,एक तरफ महाशिवरात्री का पर्व था और दिन भी मंगलवार| पर मैंने कुछ भी नहीं माना और किसी प्राणी की जान बचाने के लिए यदि अपना बर्षो पुराना प्रण तोड़ना पड़े तो हमने इसे तोड़ना ही उचित समझा| जैंसे ही उसे हाथ में लिया उसकी तीखी गंध से उल्टी आने लगी,पर हमने जैंसे-तैंसे उसकी गंध को सह लिया और स्वयं को संभाला| इतने में हमें एक दूसरी मछली दिखी पर सायद बह जिन्दगी की जंग हार चुकी है उसने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया है|
उसे एक अधेड़ आदमी ने उठा लिया था| उसने इसे भी उठाने का प्रयास किया था पर हमनें उठा लिया था| हमने उस मछली को एक पॉलीथिन में रखा और अपनी वॉटल का पानी उसमें उड़ेल दिया| इतने में वह आदमी हमारे पास आया और बोला भाई यह मछली हमें दे दो|
हमारा रात का खाना हो जायेगा,उस आदमी की आवाज़ में एक आश भरी वेदना थी| जो मुझसे यह चाहता थी कि यह मछली मुझे दे दे तो मेरा काम बन जाये | यदि वह व्यक्ति इस तरह से मुझसे मेरी जान माँगता तो मैं वह भी दे देता और मेरे मन में एक पल यह विचार आया कि क्यों न इस गरीब को ही यह मछली दे दूँ जिससे उसका रात का खाना हो जाये| पर बह मछली अभी तड़फड़ा रही है मानों मुझसे कह रही हो मुझे बचा लो, अभी मुझे नहीं जाना मुझे फिर से पानी से मिला दो| और उसकी यह तड़पन मेरे दिल को भीतर तक झकझोर रही थी| पॉलीथिन में थोड़ा सा पानी मिल जाने पर मानों उसमें जीने की लालसा और बढ़ गई थी|और वह समय समय पर अपने जीवन को बचाने बावत् हलचल कर रही है कि मुझे बचा लो |मैं उसके हाव भाव भलिभाँति पढ़ पा रहा हूँ, उसकी वह एक ही इच्छा है कि कैंसे भी मुझे कोई बचा ले| मुझे मेरे प्रिय जल से मिला दे,और मैंने ठान लिया कि अपना बस चलते तक इसे बचाने का हर प्रयास करूँगा| इसी समय मुझे कई व्यक्ति मिले जो वास्तव में इंसान थे ही नहीं बल्कि केवल इंसान होने का ढोंग कर रहे हैं| कोई आकर कहता है देखो माथे पर तिलक लगा हुआ है और काम क्या कर रहा है हाथ में मछली पकड़ रखी है, घोर कलयुग आ गया है|कोई आकर कहता है आज मंगलवार है और महाशिवरात्री का पर्व है इतनी पुण्य तिथि में इतना घोर पाप कर रहा है| हाथ में मछली पकड़ रखी है,फेंक दे उसे, और एक तरफ वह व्यक्ति हमसे मछली छीनने का प्रयास कर रहा है|मुझे वहकाने का हर सम्भव प्रयास कर रहा है| उसे केवल अपने जिव्हारस की पड़ी है,किसी प्राणी के जीवन का कोई मूल्य नहीं है|अब तो मैंने सोच लिया कि लोग कुछ भी कहें पर हम अपना निर्णय नहीं बदलेंगे| क्योंकि अब मछली का जीवन मेरे हाथ में था तो मैं उसे कैंसे मर जाने दूँ, उसे मरने तो नहीं दूँगा....,चाहे अब शंक्कर जी नाराज हों या मानवीय होने का ढिंढोरा पीटने वाले अमानव, चूँकि उस मछली की तड़पन देखकर हमारा दिल व्यथित हो रहा था| हमारे मन में यह चल रहा था कि इस मछली को कैंसे बचाया जाय फिर तालाब भी बहाँ से काफी दूर था| मैंने तरूण भाई से कहा इसे जल्द से जल्द तालाब तक पहुंचाना होगा हमारे पास वक्त कम था इसलिए हम बस का इंतजार नहीं कर सकते थे|
इसलिए तरूण भाई ने एक कारवाले को रुकने का हाथ से संकेत किया,वह कार हमारे पास आकर रुक गई|
कार में चार लोग बैठे हुए थे, जिनके माथे पर लगा चंदन का तिलक यह बता रहा है कि वह भी हमारी तरह ही शाकाहारी व उदार प्रवृत्ति के ही हैं| हमने उन्हें पूरी कहानी बताई तब कार में बैठी आँटी जी ने कहा आप यह मछली हमें दे दो हम इसे शाहपुरा स्थित ऋषभदेव उद्यान में छोड़ देंगे, मुझे उनका यह सुझाव अच्छा लगा और मैंने उन्हें मछली दे दी, उन्होंने भी मुझे भरोसा दिलाया कि हम इसे बचाने का हर सम्भव प्रयास करेंगे|
और वह निकल गए, अब आगे क्या हुआ होगा वह मछली बची भी होगी, यह तालाब तक पहुंचने से पहले जिन्दगी की जंग हार गई होगी.. यह तो भगवान ही जाने. |पर आज मुझे इंसान की प्रवृत्ति का भलिभाँति आँकलन करने की क्षमता मिली| आज का इंसान बढ़ा ही स्वार्थी हो चला है| मुझे आज एहसास हुआ कि अपने से दूर होने का दर्द क्या होता है| पहली बार किसी को इस तरह तड़पते देखा,..................................
अब हम दोनों पैदल चलते चलते ही अपने घर तक पहुचे चूँकि मछली की गंध मेरे कपड़ो में लग गयी थी,इसलिए जैंसे ही घर पहुचा तो मुझे दो-तीन उल्टियाँ हुई, पर किसी की जान बचाने में यह उल्टियाँ क्या बड़ी चीज हैं, यदि इसकी जगह हमारी जान चली जाती और किसी जीव की जान बचती तो हम खुशी-खुशी अपनी जान लुटा दें रामचरित मानस भी यही कहती है...
परहित सरस धरम नहीं भाई,......................
दुर्गेश कुमार सराठे
भाई साहब आज आपकी पहली काव्य को पर कर बहुत ही अच्छा लगा
ReplyDeleteधन्यवाद मुड़िया जी
ReplyDeleteभाई दुर्गेश,अति उत्तम।
ReplyDeleteकाफी गहनता से लिखा है।
धन्यवाद भैया......
Deleteबहुत अच्छे भाई...
ReplyDeleteआभार दोस्त
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