बूढ़ी माँ
सड़क पर निकलते ही
एक राह दिखाई देती है
एक चूल्हा कुछ आँटा गूँथे
एक बूढ़ी माँ बैठी है
न जाने कहाँ से वह वेचारी
आटा माँग-माँग कर लाई है
दर-दर पर गई होगी
न जाने कितनों से ठोकर खाई है
हे भगवान इंसान न बनाना
जिसने माँ को ऐसे ठुकराई है
हाथ जला जला कर वह
चूल्हे पर रोटी बनाती है
दुख को सीने में रखकर
ईधन के संग दुख दर्द जलाती जाती है
हाथ काँप रहे हैं उसके
हर दुख को बस सह जाती है
आँखों से आशु सूख गये हैं
वह रो कर भी न रो पाती है
हाथों में छाले पड़ गए
उनको भी वह हँसकर सह जाती है
हे भगवान मुंह छुपाये कहाँ बैठा है
तू चुप है और माँ को ठुकराई जाती है
आँखें बंद किये बैठा है तू क्या
या आँखें तेरी देख न पाँती हैं
दिल मेरा भी चीख उठा अब तो
जिह्वा कुछ कह न पाती है
दुर्गेश कुमार सराठे
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