लोकगीत
सखी संईया तो पउआ फसात है
दारू बैरन खाय जात है
दिन भर तो जो पउआ पीवे
दारू में जो दिनभर जीवे
अरी रात में जो हल्ला मचात है
दारू बैरन खाय जात है
ऐसों मचावे हल्ला गुल्ला
जाहे सुन उठ जात मुहल्ला
अरी पीकै जो ऐंसई तंगात है
बैरन दारू खाय जात है
जब से जा रढ़उआ से गोनों हो गओ
जीवो का मेरो मरवो हो गओ
मनो जा रढ़उआ है लाज नहीं आत है
बैरन दारू खाय जात है
मुन्नू चौथी में आ गओ
चुन्नू ढाई साल को हो गओ
जाहे समझई ना आत है
दारू डायन खाय जात है
दुर्गेश कुमार सराठे
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