दिलों में दरार पड़ गई

कितने सपने सजा रखे थे आँखों में,
न जाने वह कहाँ विखर गए|
आश लगाये बैठी थी आँखें,
न जाने वह पथ भी किधर गए|
वगुले बहुत उड़े गगन में,
असली शहर उजर गए|
दो मीठे जल की नदियां क्यों,
आपस में यूँ लड़ गई|
दिलों में दरार पड़ गई|

निर्मल नीर भरा था सागर,
समूह हमारा सरसिज था|
न कोई कपट भरा था मन में,
कपट रहित दिल हरगिज़ था|
कमल से कोमल हृदय में,
तड़ित दामिनि तड़ गई|
दिलों में दरार पड़ गई|

अब जो है,वह धोखा है,
या पहले जो था,वह धोखा था
क्या वह,सही में वगुले थे,
जो हमें हंस दिखाई देते थे|
या फिर,हम वगुले है,
काले रंग दिखाई देते थे|
मस्तिष्क दिलों में यूँ लड़ भई,
सायद दिलों में दरार पड़ गई|

दोस्त न जाने कहाँ गया,
प्रेम की नदिया सूख गई|
प्रेम पुष्प की कली विखर गई,
मित्रता सूखा रूख भई|
बोल चाल भी बंद हुये आपस के,
मैत्री न होने से बस्ती सारी उजड़ गई|
दिलों में दरार पड़ गई|

दुर्गेश कुमार सराठे

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