शिक्षक

इस अंधकारमय दुनिया में
शिक्षक सूरज साकार
स्वयं  तपता है जग में
औरों को देता आकार
स्वयं कभी न सोचे अपनी
स्वय सपनों को हृदय में रखकर
औरों के सपने करता साकार
स्वयं तपता है जग में
औरों को देता आकार
जैंसे शशि चाँदनी देता
सूरज तप का संचार
बस ऐंसा ही शिक्षक है
दोनों का संचित प्रकार
हमेशा ज्ञान पुंज वह वनकर
जलता है स्वयं आगे चलकर
हर लेता है हर एक मन से
काले मेघों सा अंधकार
स्वयं तपता है जग में
औरों को देता आकार
वह हमेशा निश्छल होता
वह न झूठे जग में खोता
हर दम बच्चों की खातिर
होता है उसके उर में प्यार
स्वयं तपता है जग में
औरों को देता आकार

                   2
एक शिक्षक ही होता है
जिसके हृदय में सदा
शिक्षा की उज्जवलता लिये
दीपक प्रज्वलित होता है
वह स्वयं दीपक है
स्वयं उसकी बाती
वह तेल है उसका
स्वयं ही प्रकाश की पाती
अग्नि सा वह तेज लिये
शीतलता चन्द्र की भांति

वह स्वयं ही गीता है
रामचरित मानस का मान
राम भी आगे उनके झुकते
ऐसा उनका स्थान
शिक्षा गर है नीव जीवन की
तब शिक्षक हैं जग के भगवान

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