अरे अठारह स्वागत है तेरा
नये बर्ष तू आया है
इन शीतलता लिये बहारों में
स्वागत है तेरा अरे अठारह
मेरे मन के फुलवारों में
तू आशा की नई किरण वन
बिखरजा सूने गलियारों में
निराशित मन में तू आशा भर दे
टूट चुके सपनों में प्रत्याशा भर दे
पिये हुए बैठे हैं जो गरल के प्याले
तू इस बिष को अमृत से परिभाषा कर दे
आशा की नई किरण बन
फैल निराशा के चौबारों में
अरे अठारह स्वागत है तेरा
मेरे मन के फुलवारों में
पथराई हुई आँखों में तू
फिर से चमक उठा दे
शांत पड़ा श्रृजन का ज्वालामुखी
उसमें तू फिर से उमक उठा दे
विकट विफलताओं की गंधों में
तू श्रृजनता की महक लुटा दे
ईद दिवाली सा वन जा तू
सबरे त्यौहारों में
अरे अठारह स्वागत है तेरा
मेरे मन के फुलवारों में
तू आमों पर कोयल बन घूम
वसंत ऋुतु में भँवरा बन झूम
सरसों की तू खुशबू बनजा
सूनी मेड़ों पर ओशों की बूंदों सम रमजा
दामिनि के सम आ जा तू
घोर तिमिर के दरबारों में
अरे अठारह स्वागत है तेरा
मेरे मन के फुलवारों में
रामचरित की चौपाई बन आजा
बुन्देली की गाली बन छाजा
गुलाब के फूलों सा बन आ
पुष्पों कोमल हारों में
अरे अठारह स्वागत है तेरा
मेरे मन के फुलवारों में
दुर्गेश कुमार सराठे
31/12/2017
नव वर्ष की हार्दिक हार्दिक बधाई।
ReplyDeleteऔर इस रचना के लिए आपका आभार