कब मेरा वह गाँव आये

यह दिल भी गीत गाता है
कब मेरा वह गाँव आये
वह कहानी सुनने वाला
मतभेद रहित अलाव आये
यहाँ पर बगुले बहुत हैं
कब हँसों का वह ठाँव आये
यहाँ छाया में भी तपन है
कब पीपल की वह छाँव आये

वह खेतों में बेर ढूंढना
लेटी संग होरा भूंजना
मैं फिर पहुँचू पुराने रंग में
जीवन में कुछ तो बदलाव आये

जाड़े में वह आग तापना
ठन्डी-ठण्डी राग अलापना
शाम-सकारे गुरसी में दादा-दादी
संग बच्चों का हल्ला-गुल्ला
वह सबके संग चिल्ला चोंच
जिसे सुन हिल जाए मुहल्ला
शहर में बड़ी नीचता है यारो
न जाने कब इनमें ठहराव आये
इन छलियों से कब मिले छुटकारा
कब मेरा वह निश्छल गाँव आये

दुर्गेश कुमार सराठे

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