जीवन का श्रृजन
गेहूँ के नवांकुर देख हृदय में आया
कैंसे जीवन का श्रृजन होता है
सूरज जीवन को उज्जवलता देता
धरती के उर से पैदा होता है
पानी से वह शीतलता ग्रहण कर
नमी हृदय में भरता है
भांति-भांति के तत्वों से कुछ लेकर
फिर जीवन का श्रृजन करता है
मृदा में वह स्वयं गड़ता है
न जाने कितने अवरोधों से लड़ता है
प्रकाश, खाद पानी लेकर वह
फिर जीवन का श्रृजन करता है
मेरे मन तू भी इससे सीख जरा
सब तत्वों से तू भी कुछ सीख
स्वयं हासिल कर सब कुछ
माँग किसी से न तू भीख
गेहूँ के पौधे की भांति अवरोंधों से लड़
इनका भेदन कर पथ में आगे बढ़
अभी तो तू केवल एक बीज मात्र है
बसने से पहले ही यूँ न उजड़
तू भी प्रकृति के तत्वों को अपना कर
गेंहूँ की भांति सब को संग्रह कर
असफलताओं से कतई न डर
तू भी नव जीवन का श्रृजन कर
दुर्गेश कुमार सराठे
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