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चिमनी

एक दिन न्यूज पेपर में एक घटना छपी थी,कोई प्रेम प्रसंग की घटना का उद्धरण था| जैंसा आज कल आम हो चला है| हर चौथे व्यक्ति को किसी ना किसी से प्रेम है,अब प्रेम का मतलब कितने जानते हैं| वह ईश्वर ही जाने,पर फिल्मीप्रेम जन-मन में खूब पुष्पित-फल्लवित हो रहा है| जहाँ वासना के अतिवाद को प्रेम का जामा पहना कर जनमानस के समक्ष प्रर्दशित कर दिया जाता है| और जब यह वासना प्रेम की जगह पूज्यनीय हो जाती है,तब अखबार में छपने लायक खबरों का उत्सर्जन होता है| ऐसी ही एक घटना उसदिन पेपर में छपी थी| और प्रत्येक पाठक प्रेम को खूब खरी खोटी नजरों से देख रहा था| अब घटना क्रम ही ऐसा था कि प्रेम जैंसे आत्मीय बिषय पर कलंक का काजल पोता जा रहा था और प्रेम स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहा था| सोच रहा था कि आज मानव कितना अमानवीय हो चला है| जहाँ मेरी लेशमात्र भी उपस्थिति नहीं वहाँ मुझे जबरन थकेल कर अपराधी ठहराया जा रहा है| एक छोटा सा गाँव था,जहाँ विभिन्न जाति वर्गों के लोग रहते थे| अब गाँव तो गाँव होता है,विल्कुल अपनी मस्ती में मस्त| अल्हणता का परिचायक,लोगों में आपसी प्रेमभाव भी प्रबलता लिये| किंतु गाँव जितना प्रगतिवादी नही...

कविता

शोषण की छाती छीलो, पथ  के सारे पाहन तोड़ो। जो भी तुमको रोक रहे हैं, पहले उनको पकड़ मरोड़ो। जातिवादी कुछ टुच्चे तो, रहे सदा से राहों में। लैकिन इनको तोड़ो-ताड़ो, धरो शूल अब बाँहों में। कब तक रोओगे किस्मत पर, कब तक खुद को तोड़ोगे? झूठ मूठ के इस ढर्रे को , कहो सखे कब छोड़ोगे? रुको नहीं इन रोधों पर, इनको आखिर ढहना है। नदी की भाँति बढ़े चलो, अविरल पथ पर बहना है। दुर्गेश कुमार सराठे "सजल" पुरैना कलाँ,बनखेड़ी,होशंगाबद,मध्यप्रदेश,भारत

कविता

चोर सुतों की ऐंसी तैसी, लूट रहे नित नये खजाने | सच कहने में जीभ हकलती, चुप बैठे कई जाने माने | सज्जनता के साधू बनकर, चर चर सेठ हुए सब चरकर | मातृभूमि तक चबा गए वह, सारे ऐसे  चोर चिनरकर| नहीं कलम पर बंदिश कोई, ना मैं चुप रहने वाला| चोरों को तो चोर कहूँगा, नहीं रुकेगा लिखने वाला| दुर्गेश कुमार सराठे 'सजल' पुरैना कलाँ बनखेड़ी मध्यप्रदेश 8819930876

राजनेता

फूलों को नित छलने वाले, सच को रोज मसलने वाले। पग पीड़ा को क्या समझेंगे, कालीनों  पर  चलने  वाले। भ्रष्टा जी के सगे पुत्र हैं, चोर चपाटों के साले। डाकूसुत ही बना दिये हैं| हमने अपने रखवाले। श्रमसाधक का श्रम तक चरते, अपराधयुक्त यह निर्भय फिरते। सज्जनता   का  चोला पहने, कैंसे     कैंसे    धूर्त   विचरते। दुर्गेश कुमार सराठे सजल

छुआछूत के बंधन तोड़ो

छुआछूत के बंधन तोड़ो, ऊँच नीच की माला| जातिवाद का किला ढहा दो, फैले  नया उजाला| मानव मानव मन के मन में, कोई द्वेष रहे ना| प्रेम हृदय में भर जाने दो, नफ़रत कहीं बहे ना| कभी राम ने बेर भखे थे, झूठे माता सबरी के| हम भी सबको गले लगायें, रत दें पल खुश खबरी के| दुर्गेश कुमार सराठे सजल  पुरैना कलाँ बनखेड़ी होशंगाबद मध्यप्रदेश  8819930876

त्याग तपस्या की भूमि में

त्याग तपस्या की भूमि में, नित दीपक सा जलना होगा| राहें होंगी खरी खरी सी,  लैकिन पथ पर चलना होगा| मन को छोटा करने वाले, कुछ तो तरूओं से सीखो| मौन साधकर बहता नद है, यूँ  कष्टों   से  ना  चीखो| सह पाहन के आघातों को, ना नयन नदी के रोये हैं| भू ने बिजली के आघातों को, हँस कर खूब संजोये हैं| पाहन पाहन पद चापों से, राहें सृजन कर डालो| जो भी पथ में रोक रहा है, तुरत बिसर्जन कर डालो| दुर्गेश कुमार सराठे सजल

कभी याद तो कर ही लेना

गहरी नदी के गहरे तल में, या कि डूब गए दल दल में| पता नहीं है कहाँ छिपे हो, सब कुछ भूल गए पल दो पल में| पहले दिन में बात अलग थी, बहुत मुखौटेबाजी थी| सबके सब ही सभ्य बने थे, आओ हवा जब ताजी थी| लैकिन धीरे परदे टूटे, झुण्ड अचानक बन बैठे| बहुत बढ़ी यह गुटबाजी में, फिर आपस में ठन बैठे| कभी साथ में कोई रहा था, सबकुछ कैंसे याद रहेगा| बटे हुए ए गुट प्रधानों, मन में छोटा वाद रहेगा| साथ में लेकर क्या आये थे, क्या लेकर के जाना है| कभी याद तो कर ही लेना, सब कुछ तो रह जाना है| दुर्गेश कुमार सराठे सजल