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कभी याद तो कर ही लेना

गहरी नदी के गहरे तल में, या कि डूब गए दल दल में| पता नहीं है कहाँ छिपे हो, सब कुछ भूल गए पल दो पल में| पहले दिन में बात अलग थी, बहुत मुखौटेबाजी थी| सबके सब ही सभ्य बने थे, आओ हवा जब ताजी थी| लैकिन धीरे परदे टूटे, झुण्ड अचानक बन बैठे| बहुत बढ़ी यह गुटबाजी में, फिर आपस में ठन बैठे| कभी साथ में कोई रहा था, सबकुछ कैंसे याद रहेगा| बटे हुए ए गुट प्रधानों, मन में छोटा वाद रहेगा| साथ में लेकर क्या आये थे, क्या लेकर के जाना है| कभी याद तो कर ही लेना, सब कुछ तो रह जाना है| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

मन को तनिक सजग रखना

जीवन की यह डगर गजब है, यहाँ अकेला चलना होगा। साथ ना होंगे साथी सारे, एकलता  में  ढलना  होगा। छोड़ छाड़ दो सब बंधो को,  इन्हें गले का फंद ना मानो। नाते झूठे तोड़ो सारे, इन्हें प्रेम के छंद ना मानो। दीप जगत में तम में खोया, तम का वह प्रवाहक है। शीतलता में जलन बहुत है, ठण्डी ठण्डी सी पावक है। सजल तोड़ने वाला जग है, जरा संभल कर पग रखना। घात मिलेंगे स्व हाथों से, मन को तनिक सजग रखना। दुर्गेश कुमार सराठे "सजल" पुरैना कलाँ,बनखेड़ी,नर्मदापुरम्,म.प्र.,भारत

लैकिन उतने खोटे सब

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हृदय जब से सीख गया है, बातें बड़ी दबाना| तब से शोणित भूल गया है, दिल के दरबाजे पर आना| रह रह करके रोदन करता, लहू लहू पी पी जाता| जिसके ऊपर कर रखते हम, वह कंधा फिर ढह ही जाता| कद के ऊँचे लोग बहुत से, लैकिन मन से छोटे सब| बातों से बस लगते चोखे, लैकिन उतने खोटे सब|| दुर्गेश कुमार सराठे सजल

छोड़ निकलना धारों को

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नहीं किसी से कहना कुछ भी, करनी नहीं किसी से बात| हँसकर बोझ उठायेंगे, समय ने दी है जो सौगात| घात लगाये बैठे कुछ तो, कहीं कटारैं पैनी हैं| मुझे पता है कौन कहाँ है, नहीं किसी से कहनी है| नदी के संग में चलते जा, ओढ़ो नहीं किनारों को| अगर जरूरत पड़ जाये तो, छोड़ निकलना धारों को| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

नीर नयन पर लगता भारी

आज हृदय है फिर से सूना, तन्हाई है भारी भारी| कहने दुख को शब्द नहीं हैं, नीर नयन से बहना जारी| नहीं कोई अब अपना दिखता, दूरी सबने ठान रखी| जिन्हें हृदय से अपना माना, खड्ग उन्हीं ने तान रखी| नदी नीर से हुई नदारद, नीर नयन पर लगता भारी| फूल स्वयं ही तूटा ना था, उसकी कोमलता थी हत्यारी| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया?

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बड़ी नदियाँ,बही नदियाँ| बढ़ी नदियाँ,धरा के जहन में गढ़ी नदियाँ| ए निर्लज्ज लोगों,बताओ कहाँ नदियाँ? ना उनमें रेत ओ बालू| हर घाट में उत्खनन चालू| ना बची हैं मीन भीतर, तटों पर दिखते नहीं कबूतर| टूट-टूट कर हो गई वह दरिया| ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया? दिखते नहीं हरे भरे से किनारे, चर गए हम लोग सारे| जान टूटी मृत हुई धारा| रो रहा विरहा किनारा| ना जहन में रहा पानी, दिखती नहीं कोई कहानी| नदि सुकड़ कर हो रही मरिया| ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया| बैठा दिए बक्ष पर कारखाने, नाले सब नदी में घुसाने| नदी की बाँध दी धारा, है मानव का उत्पात सारा| नित नये नाले बहाकर, सुखा दी उसकी अंतड़ियां| ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया| ना सरसिज हैं ना बचे मुर्गे,  खा  गए  सब  शीर्ष गुर्गे| मरे कछुए लुप्त सीपी, मिलती नहीं बतखें सरीखी| कहाँ हैं राज सारे तोड़ो सब किवरिया, ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

कालिख

पत्थर के कागज पर कोयले की कलम से| कभी लिखा था तुम्हारा नाम, तब पता नहीं था कोयला कालिख युक्त होता है| भान ही नहीं था.... कि हाथ भी काले हो सकते हैं, और चहरा भी| बस लिख दिया था.. जो मन में आया| हृदय ने जो गाया, वक्त ने जो बतलाया| और कर बैठे हाथ काले, चहरे पर भी पौंछ डाले| कोयले को श्यामवर्ण का चंदन समझकर, कपड़े भी सन गए थे| मगर पता चला कि, कोयले में कालिख होती है| दुर्गेश कुमार सराठे सजल