वासना
कहते हैं लोग होता प्यार पूरा नहीं
लैकिन मुझे प्यार की परिभाषा ही समझ न आती है
क्यों लोग करते हैं ऐसा प्यार
जिसके पूरा होने में कुदरत भी साथ न निभाती है
आखिर कार कैंसे होता यह प्यार
मुझे आपस में बढ़ा उलझाती है
सायद में जिसे कहता हूँ कामुकता
दुनिया उसे प्यार बतलाती है
कहते हैं लोग प्यार करते नहीं हो जाता है
तो दुनिया प्रकृति से काहे न कर पाती है
मार काट रहे एक दूजे को लोग
दुनिया लोगों को काहे सताती है
जो लोग कहते हैं, प्यार करते नहीं हो जाता है
वे लोग अज्ञान वस ऐसा बतियाते हैं
प्यार समझे नहीं ऊंच-नीच जाति-पांति
तो फिर नारी को छोड़ सुअर से काहे न कर पाते है
प्यार तो समझता नहीं है कुछ
तो फिर सुअर को गंदा क्यों समझ जाते हैं
प्यार तो वही होता यार,
जिसमें सकल जग से प्यार कर पाते है
प्यार गर सच्चा हो तो मित्रों
सच्चे प्यार में लोग सुअर से भी प्रेम कर जाते हैं
दुर्गेश कुमार सराठे
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