सन्ध्या काल का शांत जलाशय
शांत जलाशय का पानी
मन में हिलोरे लेता है
दावानल सा उबल रहा है
मुझसे कुछ कहता है
सूरज की लालिमा में रंगकर
रक्तिम स्वरूप दिखाता है
अपने शांत रूप में भी मानो
क्रोध हमे बतलाता है
सूरज जब धीरे-धीरे ढलता है
नभ मानो ठण्डी अग्नि सा जलता है
शांत पवन है, शांत मेरा मन है
जलाशयके ऊपर न पंछी कोई टहलता है
जब सूरज की रक्तिम किरणें पानी में आती हैं
जलाशय का पूरा पानी रक्तिम सा कर जाती हैं
शांत जलाशय को देख हृदय में
नूतन दृश्य अंकुर लेता है
शांत जलाशय मुझसे कुछ कहता है
सन्ध्या काल की यह बेला
शांत जलाशय मैं अलबेला
ऐंसा लगता है मानो हृदय गति रुक आई हो
ऐसी पावन बेला में कोई बासंती पुरवाई हो
पवन भी शांत बैठकर,जलाशय के तट पर
दिन भर थककर निद्रा लेने आई हो
लहर जलाशय की सोई सी है,पंछी डाली पर बैठ गए
लगता है जैंसे प्रकृति में मादकता छाई हो
प्रकृति में एक अजब सी खामोशी है
कण-कण में लगता है यह कैंसी मदहोशी है
भीनी-भीनी गंध फैलती है तन-मन में
लगता है कोई प्रेम प्रसंग की पुरवाई हो
हम सब पाहुन वन बैठे हैं
मानो सूरज की किरणें लाल पुष्प ले आई हो
यह सब दृश्य देख ऐंसा लगता है मानो
जैंसे प्रकृति की गोद भराई हो
दुर्गेश कुमार सराठे
Comments
Post a Comment