दुख
आज कुछ कविता लिखने का मन नहीं है, आज तो वह लिख रहा हूँ जो एक लेखक लिखने की कोशिश करता है जब हम कभी बहुत दुखी होते हैं, और मन में किसी बात को लेकर अंतरद्वन्द चल रहा होता है तब मन बढ़ा बैचेन हो उठता है,मन की दशा ऐंसी होती है, जैंसे मछली को पानी से बाहर निकाल देने पर होती है ,हमारा मन संसार के दुखों से आहत हो झटपटा पड़ता है ,और वह जल्द से जल्द इन दुखों से बाहर आने का प्रयास करता है| किन्तु इस स्थिति से बाहर निकल पाना इतना आसान नहीं होता है, हर कोई दुखों के इस धरातल से सुख रूपी जल में छलांग नहीं लगा पाता है
कई लोग होते हैं जो इन सब से आहत हो प्राण त्याग देते हैं अथवा प्रण त्याग देते हैं, दोनों ही स्थिति में पराजय का सामना करना पड़ता है,और कई ऐंसे होते हैं जो इनसे संघर्ष कर पाने में सफल हो पाते हैं, और न प्रण त्यागते हैं और न प्राण ऐंसे लोगों को अपना लक्ष्य प्राप्त होता है|वहीं दूसरी ओर जो इसमें लिप्त हो लुप्त हो जाते हैं वह पराजय का रसास्वादन करते हैं, प्रायः लोग इनसे लड़ने की बजाह दूर भागना श्रेयस्कर मानते हैं, जबकि इन से भागने की बजाह या तो लड़ लिया जाना चाहिए या लिप्त होकर उनका आनन्द उठा लेना चाहिए, दोनो ही स्थिति लाभ दायक होती हैं, यदि लड़ गए तो जय जय कार होगी, और उनका भोग कर लिया तो वह अनुभव प्राप्त होगा जो विरले लोगो को ही प्राप्त होता है,अपने आप को कठोर बना देंगे...,
दुख की यह स्थितियाँ व्यक्ति को कठोरता प्रदान करते हैं
उसे तपा कर और अधिक सक्षम वनाने का कार्य करते हैं ..............
लैकिन समस्या तब होती है जब व्यक्ति अत्याधिक तनाव में होता है,जब उसे कुछ भी सूझ नहीं पड़ता,उसकी हालत बहुत ही उलझी हुई होती है| वह ना तो स्वयं के बारे में सोच पाता है और ना ही अपने परिवार वालों के बारे में,यहाँ तक की वह अपने दोस्तों से भी दूरी बना लेता है,.... सब से कट जाना चाहता है उसे बस अकेला रहना अच्छा लगता है| बस यही वब समय होता है जब उसे अपने परिवार की अपने दोस्तों की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, लैकिन बिडम्बना यह होती है कि ना तो परिवार वाले उसके इस स्वभाव को पढ़ पाते हैं,और ना ही उसके अपने दोस्त|......क्योंकि जब आप किसी से एक बार बात नहीं करोगे या उसे अनदेखा करोगे तो सामने वाला भी मानव ही तो है वह भी उससे बात करना बंद कर देगा..और पीड़ित को अकड़ू समझ लेगा...लैकिन वहाँ हमें उसके इस अचानक बदले स्वभाव का बारीकि से अध्ययन करना चाहिए...वह भले हमें अनदेखा कर दे ,लैकिन हमें उसके प्रति अपने व्यवहार में कोइ परिवर्तन नहीं करना चाहिए| इसका परिणाम यह होगा कि उसके मन में यह नहीं आयेगा कि मैं अकेला हूँ..बल्कि उसे अनजाने में ही हमारा साथ मिलेगा...और उसकी जीवन शक्ति क्षीण होने से बच जायेगी..
लैकिन यह इतना आसान नहीं है हम लौगों को समझ नहीं पाते...,और समझने का प्रयास भी नहीं करते|
और हमारा बदला स्वभाव उसके स्वभाव को और उत्तेजित कर देता है,अब हमारी एक छोटी सी बात भी उसे गहरा आघात पहुँचा देती है, और होता यह कि व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है,और जो एकबार किसी पर अवसाद चढ़ा कि उसे दुनिया बिरोधी लगने लगती है..यहाँ तक की संगीत,खाना,सोना ,सब जहर के समान दिखते हैं,उसे कोयल भी हकलाती नजर आती है,नदियों की कल कल शोर लगने लगती है....और अंत में व्यक्ति मौत को गले लगा लेता है....आत्महत्या कर लेता है...पर यह सब कुछ अचानक नहीं होता कि किसी ने कुछ कहा और आत्महत्या कर ली...यह सब एक लम्बी प्रक्रिया के साथ होता है..और कहीं ना कहींं यदि उसके आस-पास अच्छे व्यक्ति हों ,अच्छे दोस्त हों तब किसी उसे बचाया जा सकता है....., मौत के रास्ते को मोड़ा जा सकता है..,
यदि अच्छे लोगों का साथ हो तो दुखों को सहन करने में मदद मिलती है,और हर समस्या का हल मिलता है|
इसके केवल दो रास्ते हैं,पहला अच्छे दोस्त और दूसरा अच्छा साहित्य यदि दोनों में से कोइ एक भी साथ है तो अवसाद आपसे कोषों दूर है..........
दुर्गेश कुमार सराठे
एकदम सटीक लिखा है भाई आपने,बिना युद्ध के विजय संभव नही।
ReplyDeleteयह लेख काफी इंस्पिरेटिनॉल है।
Excellent
धन्यवाद भैया...
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