पेड़ की व्यथा
अरे भइया मेरो का दोष हतो,
जो तूने मोहे निपटा दओ|
मैंने तोहे मोड़ा-मोड़ी समझो,
तू मेहे काट-कूट के ले गओ|
मैनें तोहे अपने फल दे दये,
तू पत्ता तक ले गओ|
तूने मेरी लकड़ी काटी,
और अब जड़े खोदवे आ गओ|
मैंने तोहे छंईया दई जब,
बैशाख जेठ को चमकत थो घामों|
और तू मोहे काट के ले गओ,
और तूने बड़ेरी के नीचे,
मोहे गड़ा दओ बना के थामों|
और अब जे कछु ठूंठ बचे हैं,
तू जिने भी खोद के ले गओ|
मेरी जड़े तक नइ छोड़ी,
चूल्हे में मोहे दे दओ|
अरे लोभी,तूने कछु नइ सोची मेरी,
मनों,मैंने सब इच्छायें पूरी कर दईं तेरी|
मैंने,अपनी साखाए तोहे दे दईं,
जिनसे छत तूने अपनी बनबाई|
और तूने तो मेरी, पत्ती तक ले गओ,
अपने ढोरन खों चरवाईं,तोहे सरम नइ आइ|
मैं जनम से लेके मरत तक,
सब काम करत रओ तेरे|
मनो तू बड़ो घिना है रे,
तूने पौधे तक नइ पनपन दय मेरे|
सुन ले लोभी कहूँ,
तू ऐसइ काटत रओ मेहे|
तब एक दिन ऐसो आ है,
घुट-घुट के मरने पर हे तेहे|
अरे मैंतो एक पेड़ो हे थो,
तूने मोहे तक नइ छोड़ो|
तू परक्रति के नियम में,
टाँग अड़ा रओ है|
तूने परकरति के नियमों है तोड़ो,
और फिर कह रओ है|
बर्षा नइ हो रइ,
सांस लेय में तक|
दिक्कत भारी हो रइ,
अरे जो सब मेरे नइ,
रहवे को परनाम है|
जा बिकट व्यथा के पीछे,
सब तेरे उल्टे काम हैं|
तूने मोहे तो काटो पर,
आगे की बिल्कुल नइ सोची|
तनक मोहे छोड़ दव होतो,
तो तेरी जा गत बिल्कुल नइ होती|
दुर्गेश कुमार सराठे
पेड़ की व्यथा को अपने शब्दों में बखूबी पिरोए हो दुर्गेश भाई।
ReplyDeleteपेड़ की व्यथा को अपने शब्दों में बखूबी पिरोए हो दुर्गेश भाई।
ReplyDeleteधन्यवाद भैया
Deleteये भाषा खूब भा गई
ReplyDeleteअपनी मातृभाषा है राज भाई
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