क्या कहूँ मैं अपने मन से?

क्या कहूँ मैं अपने मन से
बड़ा उदास हुआ जाता है
जब देखो तब न जाने क्यों
बड़ा हतास हुआ जाता है

आज तो मैं डूब गया हूँ
न जाने कौन सा गम है
यहाँ पर दुख का सागर है
मीठे जल की नदियाँ कम हैं

मन बड़ा बिकल-सा रहता है
कुछ मुझसे दुखड़ा कहता है
जाने अनजाने ही वह क्यों
चिड़ा-चिड़़ा सा रहता है
मेरा मन बड़ा विकल सा रहता है

दिल के समझानेें पर वह
कुछ तो समझ जाता है
लैकिन फिर भी न जाने क्यों
दुख से घुमड़ा रहता है

कुछ मुझसे वह
अपना दुखड़ा कहता है
न जाने क्यों ऐसे वह
जुड़ा हुआ सा
टुकड़ा-टुकड़ा रहता है
मेरा मन बड़ा विकल सा रहता है

दुर्गेश कुमार सराठे

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