मित्रता

इस ज़िन्दगी में दोस्तों का होना एक मजा है
मगर ज्यादा दोस्त होना भी कुदरती सजा है
जिसके हजारो दोस्त लैकिन फिर भी दुखी है
और दोस्त नहीं है जिनके वह भी दुखी है
दोस्ती हो तो दुर्योधन कर्ण के जैसी
कृष्ण ने सुदामा के साथ निभाई वैसी
वरना मतलबी मित्र तो हजारों पड़े हैं
कृष्ण-सुदामा के जैंसे कलयुग में कहाँ
इस युग में दोस्ती ऐसी भी होती है
अगर दोस्त को जरूरत हो तो तीस मील दूर ही खड़े है
पहले दोस्ती होती थी निभाने की खातिर
पर अब तो मतलब की खातिर होती है यारी
यदि आप किसी के काबिल हैं तो
हजारों से दोस्ती आपकी रहेगी प्यारी
यदि जरूरत पड़ जाए कभी आपको उनसे
तब सब के सब हट जायेंगे ऐसे
कभी पहचानते ही न थे कोई रिश्ता न हो जैसे
पर अभी भी सच्चे मित्रों का कोष रिक्त नहीं है
बचे हुए हैं कुछ जो मित्रता की कसौटी पर सही हैं

दुर्गेश कुमार सराठे

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