बचपन का मित्र

कभी -कभी ऐसा भी होता है
बर्षों के समय निकलने पर
वह बचपन का प्रिय मित्र
इन आँखों के सम्मुख होता है
तब आंखे हर्षित हो जाती है
हृदय में कली बर्षा होती है
मन भी मीन बना होता है
जब वह बचपन का मित्र
इन आँखों के सम्मुख होता है

सोचो अगर कहीं बर्षों से
उससे न मिल पाये हों
उसकी यादों को भी
मन में धारण न कर पाये हों
अचानक वह हमारी
दृष्टि के सम्मुख आ जाये
और आकर बोले
दुर्गेश कहाँ था अब तक
तब सच कहता हूँ यारो
हृदय भी मीन बना
सागर में गोते खाता है
बह बचपन का मित्र अगर
आँखों के सम्मुख आता है

बह बचपन में 
उसके साथ घूमते
दुनिया के रंगी
सपनो को चूमते
बचपन का आरम्भ
हुआ हो जिससे
पहली कक्षा में
मैत्री सम्बन्ध
बना हो जिससे
बचपन में जिसके
संग खैला करते थे
बचपन में जिसको
हम झेला करते थे
जिसके संग बचपन में
झूमा झटकी करते थे
छोटी-छोटी बातों को लेकर
उससे बड़ा झगड़ते थे
जब मित्र अचानक
आँखों के सम्मुख आता है
तब सच कहता हूँ मित्रों
मन भी फिर मीन बना
सागर में गोते खाता है

बचपन के मित्रों में यारो
बात गजब की होती थी
उससे कितना भी दूर रहे
फिर भी दूरी कभी न होती थी
कभी उसका टिफिन चुराकर
हम खा जाते थे
फिर अपना लंच
स्व हाथो से उसे खिलाते थे
जब अचानक ऐसा मित्र कहीं
आँखों के सम्मुख आता है
तब मन हर्षित होता है
हृदय में बसंत उमड़ जाता है

होमवर्क कभी पूर्ण न हो तब
अपने मित्रों से करवा लेते थे
लेखन कार्य पूरा न होने पर
तब हम उससे करवा लेते थे
गणित अगर समझ न आती
तब वह हमे समझा देता था
वह जब कभी शिक्षक वनकर
हमें कुछ समझाया करता था
यह नजारा बड़ा गजब था यारो
इसके आगे सुंदरता का भी सर
झुक जाया करता था
अगर कहीं बर्षों के समय निकलने
पर वह बचपन का प्रिय मित्र
इन आँखों के सम्मुख आता है
तब हृदय भी मीन बना
सागर में गोते खाता है

लड़ने पर भी वह
गृहकार्य करवा देता था
कितना भी लड़ने पर
दूर कभी न हमसे होता था
लड़ने के बाद में हम उसके संग
बबूल के नीचे बैठा करते थे
चुपके से जाकर
उसकी आँखें अपने हाथों से
बंद किया करते थे
और उससे फिर
अपना परिचय पूछा करते थे
फिर बह पहचान हमें जब जाता
इसको भी जादू बढ़ा समझते थे
जब कभी अचानक वह प्यारा दोस्त
इन आँखों के सम्मुख आता है
तब सच कहता हूँ यारो
मन मीन बना सागर में गोते खाता है

जिस दिन मिलता है
वह बचपन का मित्र
उस दिन दीवाली
होली ईद सब कुछ
एक साथ में होता है
जब कभी बह बचपन का मित्र
इन आँखों के सम्मुख आता है

दुर्गेश कुमार सराठे

Comments

  1. आँखों से अंशु आने लगे भैया

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    1. इसका मतलब है कि हम भी अब भावों का सटीक चित्रण करने लगे हैं, बचपन के मित्रों में बात ही कुछ और होती है,उन्हे याद कर रोना तो स्वभाविक है

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  2. Kya baat h mama ....
    Mohit Shukla

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  3. अच्छा चित्रण....

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद आचार्य जी...

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