हे भगवान बनवा दो पटवारी
पढ़े लिखे ठलुओ को
खुश खबरी आई भारी
सबरे कह रह
हे भगवान हमे अब तो
बनवा दो पटवारी
बहुत दिनों से बैठे थे
खत्म हुई इंतजार की पारी
हे भगवान अब तो
हमें बनवा दो पटवारी
अतिथि शिक्षक बैठे रहे
अतिथि बनकर अब तक
दहरी के भीतर न बाहर
मामा तेरे आगे सब बात उजागर
ग्यारह से सत्रह में आ गये
फिर भी हाथ में रीती गागर
बिचारे शिक्षक वनवे बारे भी
शिक्षा हे कोने में रखकर
खेत नाप वे की कर रह तैयारी
हे भगवान अब तो
हमें बनवा दो पटवारी
मंदिर में भक्तों की
भीड़ सी बड़ गई
जो सपरत नहीं थे
बीस-बीस दिन तक
उनके माथे रोरी चढ़ गई
भुनसारे से जल को
लोटा हाथ में लेकर
पीपर के चक्कर मारें
जो कभी मंदिर तन
देखत नहीं थे
वे दिया हाथ में लेके
आरती तेरी उतारे
पढ़-लिख के अब तक
नौकरी के इंतज़ार में झकमारी
हे भगवान अब तो
हमें बनवा दो पटवारी
एम. एस. सी. से लेकर
बी. एस. सी. तक के
एम. ए. से लेकर
बी.ए.तक के
पी. एच. डी. सम डिग्री धारी
कह रह अब तो
हे भगवान अब तो
हमें बनवा दो पटवारी
दुर्गेश कुमार ने इनकी व्यथा
कलम से पृष्ठों पर आज उतारी
हे भगवान बिचारे इन लोगन खों
बनवा दो पटवारी
दुर्गेश कुमार सराठे
Pranam bhaiya bahut khoob
ReplyDeletebahut acchhhhe
ReplyDeletePranam bhaiya bahut khoob
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteBahut badhiya Durgesh bhaiya
ReplyDeleteधन्यवाद राज भाई
ReplyDeleteअप्रतिम
ReplyDeleteधन्यवाद मुड़िया जी
ReplyDeleteबाह. दुर्गेश बहुत ही उमदा, क्या खूब लिखा है
ReplyDeleteधन्यवाद बड़े भैया
DeleteFabulous
ReplyDeleteभाई......
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