चिड़िया

एक चिड़िया एक दिन
मेरे आँगन में आई
पता नहीं वह मुझे देखकर
क्यों विचकती पंख फड़फड़ाई
सायद वह मुझे देखकर
डर गई थी
पर उसने अपनी चालाकी
पूरी-पूरी मुझे दिखाई
जब मैं उसे दाना देने आया
तब भी वह मुझसे दूर रही
सायद उसे कहीं डर था
कि मैंने जाल तो नहीं बिछाई
एक दिन एक चिड़िया
मेरे आँगन में आई
मैं आँगन से दूर गया
और उसने मेरे जाते ही
दाना चुगना शुरू किया
पर वह चौकन्नी थी
दाना खाते-खाते भी
वह हमेशा इधर-उधर
देखा करती थी
सायद उसे पता था
मानव की चालाकी
इसीलिए वह हमेशा
डरी-डरी दाना खाती
कुछ सकुचाती कुछ शर्माती
कभी मुझे देखकर उड़ती
फिर उड़कर वापस आ जाती
सुबह से दुपहर हो गई
और यह क्रम चलता रहा
कभी उड़ डाली पर जा बैठे
तो कभी वापस आकर
चुगने को आँगन में आ बैठे
मैं उसे बस यूं ही
ताकता रहा दिनभर
मैं दृष्टि हटा भी न पाया
उससे कभी भी पलभर
उसका यह आना-जाना
मानो मुझे कुछ कह रहा हो
की तू क्यों बैठा है
रुकना नहीं है तुझे यहाँ
अगर बैठा रहा एक जगह
तब आगे कैंसे जायेगा
रहा ताकता गर मुझे तो
अपने उद्देश्यों को कैसे पायेगा
तू भी जा और जाकर आ
आने-जाने में तुझे
कुछ तो हासिल होगा
बैठा रहा गर ऐंसे ही
तब क्या कर पायेगा
यह स्थिर होना तेरा
तुझे बढ़ा सतायेगा
इसी लिए तो वह चिड़िया
आती है और जाती है
तभी तो वह अपने
उद्देश्यों को पाती है
पर मैं कुछ समझ
ही नहीं पाया उसको
वह क्यों जाती है
और फिर वापस आती है
क्यों वह डाली पर बैठी
और आँगन में आकर
डरी-डरी सीक्यों चहकी
उसने मुझे बढ़ा उलझाया
वह मेरे ही आँगन में क्यों आई
मुझे ही उसने क्यों
अपनी छटा दिखलाई
सायद वह मुझे समझाने आई थी
कि यूं न बैठा कर
नही तो छला जायेगा
फिर न कहना समझाया नहीं
नहीं तो यूं ही पछतायेगा
चिड़िया ने सायद
मुझे एक नई राह दिखाई
एक दिन एक चिड़िया
मेरे आँगन में आई

दुर्गेश कुमार सराठे



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