अनामित
जब कभी अत्यधिक परेशान होता हूं तब नींद मैं भी नींद लेने की कोशिश करता हूं| किंतु होता वही है जो बरसों से होता रहा है वहीं रात के 2:00 बजे अचानक सोते-सोते जोर से चिल्लाना और फिर रजाई में मुंह दबोच कर सो जाना| यह घटनाक्रम मेरे साथ बचपन से चला आ रहा है जिस दिन ज्यादा दिमागी थकान होती है तो यही घटना कौंध मचाती है |अब इसे इत्तेफाक भी कह सकते हैं या फिर मेरे मन की कल्पना | किंतु मैं इस घटना से हमेशा आश्चर्यचकित रहता हूं| वर्षों से एक ही घटनाक्रम का दोहराव और समय का निश्चित होना यहां तक कि वही एक स्वप्न जो बार बार स्मृति में आता है और केवल एक ही जगह रुका हुआ है हमेशा वहीं आकर टूट जाता है|और समय भी निश्चित है रात के दो बजे मुझे जब भी यह स्वप्न आया है और यह घटना घटी है,तब मैंने हमेशा घड़ी देखी है और समय 2:00 बजे ही निकला है,हो सकता है यह कोई इत्तेफाक हो पर इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है| दरअसल होता क्या है वह मैं आपको विस्तार से बताता हूं | एक दिन शाम को थोड़ा थका थका महसूस कर रहा था और जल्दी सो गया उस दिन नींद भी अच्छी लगी थी किंतु कुछ ही देर बाद वही सपना जिसका मैंने जिक्र किया | मैं एक ऐसी रेलवे स्टेशन पर खड़ा हूं जो बिल्कुल खंडहर है ,ना जहां पर कोई यात्री है और नाही स्टाफ के कर्मचारी शायद यहां कोई ट्रेन वी नहीं रुकती हर तरफ अंधेरे ने डेरा डाल रखा है अंधेरे के सिवाय यहां कुछ भी नजर नहीं आता रेल की एकल पटरी है और कुछ नहीं ,यात्रियों के बैठने की कुर्सियां डली हैं, और पूरे स्टेशन पर मकड़ियों के जाले बुने हुए हैं| पर यह कुर्सी थोड़ी साफ है मानो इसे कोई साफ रखता है पर यहां दूर-दूर तक इंसानों का कोई अस्तित्व ही नहीं दिखता तब किसी का रोज इस कुर्सी को साफ रखने का प्रश्न ही निराधार है मैं अकेला ना कुछ सोच पा रहा हूं नाही कुछ कर पा रहा हूं बस अबाक सहमा सा खड़ा हूं थोड़ी देर खड़ा रहने के बाद मैं वहां पर इधर उधर टहलने लगता हूं कभी पटरियों पर चलता तो कभी स्टेशन के बरामदे मैं चक्कर काटने लगता हूं | पर यह क्या यहां की पटरिया भी अस्त व्यस्त है ,पूरी तरह उखड़ी पड़ी है |कुछ समझ नहीं आता यह रेलवे स्टेशन है या फिर कबाड़ घर शायद पहले कभी यहां रेलवे स्टेशन रहा हो| पर अब तो सब कुछ अस्त-व्यस्त है, मैं कुछ समय तक इसके बारे में कल्पना करता रहा और मन में सोचते विचारते इधर-उधर फिरता रहा समय कुछ बढ़ता है और आसमान में चंद्रमा का आगमन होता है और चारों तरफ अंधेरा थोड़ा काम होता है और शशि का शीतल प्रकाश यत्र तत्र बिखर जाता है बड़ा ही मनोरम दृश्य आकार लेने लगता है ऐसा लगता है मानो शीतलता ओढ़े दिन यहां पर आ गया हो मैं जाकर उसी कुर्सी पर बैठ जाता हूं जो थोड़ी साफ थी कुछ देर मैं यूं ही बैठा रहता हूं पर कुछ समय पश्चात किसी के आने की आहट महसूस होती है पर जब मैं पलट कर देखता हूं तो कोई नजर नहीं आता और मैं आंखें बंद कर चंद्रमा के अनुपम सौंदर्य का अंतर्मन से आनंद उठाने की कोशिश करता हूं किंतु यह क्या कुछ देर में कोई आकर मेरी आँखें अपने हाथों से बंद कर देता है हम चौक जाते हैं की कौन है पर स्पर्श जाना पहचाना लगता है पर मैं इसे पहचान नहीं पता और वह भी बताने का कष्ट नहीं करता जैसे ही हम पलटते हैं और आंखें खोलते है सामने होता है हमारी तरह दुबला सा लड़का जिसकी आंखों मैं गहराई को देखा जा सकता है मुस्कुराता चेहरा अलग ही छटा बिखेरता है मैं अवाक हूं मन में सोचता हूं इसे कहीं तो देखा है पर देखा कहां है वह मुझे भी याद नहीं पर यह मुझे पूर्णता चिर परिचित जान पड़ता है किंतु मैं उसे बिल्कुल भी पहचान नहीं पाता मैंने उससे पूछा भी भाई तुम कौन हो बताओगे पर वह केवल मुस्कुरा देता है पर जुबां से कुछ नहीं कहता मेरे हर प्रश्न का उत्तर केवल मुस्कुराहट था मैं प्रश्न पर प्रश्न पूछता जाता और वह केवल धीरे से मुस्कुराता जाता किंतु मेरे बार-बार प्रश्न पूछने पर वह धीरे से बोला
भाई मुझे नहीं जानते
मैं- नहीं देखा तो है,और पहचान नहीं पा रहा हूं
वह- पहचान जाओगे तनिक अपनी स्मृति पर जोर डालो
मैं -नहीं भाई नहीं पहचान पा रहा हूं
वह -कोशिश करो
मैं- भाई तुम ही बता दो कौन हो मेरी समझ नहीं आता
वह -अरे दुर्गेश भाई तुम भी छोड़ो नहीं आ रहा तो
मैं -अरे तुम मेरा नाम कैसे जानते हो
वह -मुझे सब पता है
मैं -कैसे
वह -बस पता है यह ना पूछो कैसे
मैं भाई बताओ तो
वह -अरे यार दुर्गेश तू बड़ा जिद्दी है सुधरेगा नहीं
मैं -अरे भाई तुम हर बात का उत्तर प्रश्न से ही देते हो
वह-तुम्हारी आदत लग गई यार
मैं -मेरी आदत पर मैं तो हर प्रश्न का उत्तर देता हूं
वह -उत्तर देते हो पर पहले नहीं
मैं -मतलब वह कुछ नहीं समझ जाओगे
मैं -क्या
वाह- यही सब कुछ
मैं- भाई तू पागल कर देगा
वह -नहीं यार तू बिल्कुल नहीं सुधरा अड़ियल का अड़ियल
मैं -चलो खैर छोड़ो यह सब तुम यह बताओ तुम्हारा नाम क्या है
वह- तुम्हें पता है बस अपने मन की गहराई में उतरो मैं वहीं मिलूंगा
मैं -भाई तुमने मेरी किसी भी जिज्ञासा का सीधा उत्तर ना देने की कसम खा रखी है क्या
वह -नहीं खैर छोड़ो यह सब फालतू बातें हैं तुम्हें अभी समय लगेगा सब कुछ समझने में यह बताओ आजकल क्या कर रहे हो
मैं -कुछ नहीं तुझसे बकवास
वह -हा हा हा तू हमेशा बकवास ही तो करता है
मैं-क्यों भाई तुझसे कब बकवास कर ली
वह-अभी तो करते ही जा रहा है
मैं -देख भाई अब गुस्सा ना दिला तू
वह- अरे नहीं दुर्गेश तू तो बुरा मान गया चल माफ कर देना इस बात के लिए तुझे परेशान किया, अच्छा चल ठीक है रात ज्यादा हो गई है तू भी सो जा और मैं भी चलता हूं |हां अगली बार जब मिलेगा तब कोई प्रश्न मत पूछना
मैं -पूछूंगा पूछूंगा पूछूंगा पूछूंगा
भाई बताते तो जा कौन है तू ?
वह -तेरा दोस्त.......
और आकर गले से लिपट जाता है उसका इस तरह का व्यवहार वास्तव में किसी अजीज मित्र का व्यवहार जान पड़ता था और बस यहीं आकर नींद टूट जाती है और मैं चिल्लाया अरे नाम तो बताता जा.....यही चिल्लाते नींद खुली और देखा तो मेरा पूरा शरीर पसीने में भीग गया है | मैं बिस्तर से उठा पानी पिया और सो गया यह सपना मुझे बचपन से आता है बस यही घटना दिखती है वह अनामित दोस्त मिलता है और बिछुड़जाता है उसका नाम हमेशा प्रश्न बना रहता है|
दुर्गेश कुमार सराठे
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