दौड़

आज सुबह से ही मेरे माथे पर चिंताओं की धारायें दृष्टव्य हो रहीं थी,पता नहीं कैंसी अकुलाहट थी| पर कोई तो बात थी,जिससे मन डरा हुआ था| लैकिन इस प्रश्न का उत्तर मुझे स्वयं ही नहीं मिला| कॉलेज जाने के लिए तैयार हुआ बाहर जाम लगा हुआ है,घर बापस आ गया| सोचा अब घर पर ही पढ़ाई कर ली जाये पर दूसरे काम जैंसे मेरा ही इंतजार कर रहे थे| कब आ पहुँचू,चंगुल में ,और आज आ ही गया ऊँट पहाड़ के नीचे| मैनें जल्दी जल्दी सारे काम निपटाये और एक बजे तक सबसे फुर्सत हो कर खाना खाया|और पढ़ने बैठ गया,तीन बजे तक पढ़ता रहा ,किन्तु इसी बीच कब हमारी आँख लग गई पता ही नहीं चला| आधी नींद हो गई होगी सायद तभी मुझे लगा मैं दौड़े जा रहा हूँ,पर क्यों दौड़े जा रहा हूँ इसका कुछ पता नहीं बस लम्पट दौड़ रहा हूँ|
सबसे पहले लगता है संस्थान पहुँचा हूँ रूम नम्बर 18 पर यब क्या यह जगह तो मेरा संस्थान नहीं है,वही पुराने जमाने का सागौनी गेट,मोटे मोटे कोनियों वाले छप्पर से सजा कवेली खपड़ों का कमरा,हाँ रूम नम्बर 18 ही है पर मेरे स्कूल का है जिसमें कभी पढ़ते थे,बाहर कोई व्यक्ति बैठा है,मैं उसे नजरअंदाज करते हुए सीधा भीतर चला जाता हूँ,अंदर कोइ भी नहीं बस चार छः लोग साफसफाई कर रहे हैं,पंखों के जाले निकाल रहे हैं,मैं दबे पाँव वहाँ से निकल आता हूँ,और फिर दौड़ रहा हूँ,मुझे स्वयं पता नहीं आखिर ऐसी क्या जल्दी है जो दौड़ना पड़ रहा है| बस दौड़ता जा रहा हूँ बिल्कुल सरपट हो रहा हूँ,कभी किसी से बात चीत भी नहीं हो पाती है बस देखता हूँ और फिर दौड़ पड़ता हूँ,दौड़ते दौड़ते कब कहाँ पहुँच जाता हूँ मुझे भी पता नहीं चलता अचानक एक जगह किसी ने आवाज दी... दुर्गेश.... रुको तनिक मेरा एक काम करते हुए जाओ ,वहाँ जो गलियारे में कुर्सी रखी है तनिक कक्षा तक पहुँचा दो,यह आवाज किसकी थी मुझे पहचान में ही नहीं आई हाँ पर मैने कुर्सी उठाई और कक्षा में पटक दी... और वहाँ से फिर दौड़ना शुरू पता नहीं क्या हो रहा था... दौड़े जा रहा हूँ दौड़े जा रबा हूूँ,अचानक एक जगह फिर कदम ठहर जाते हैं ,मुझे देखते ही बहाँ वैठे सज्जन कहते हैं क्यों भाई आज तो 29 तारीख है किसका जन्मदिन है कुछ याद नहीं है... मैं बिल्कुल नहीं समझा वह क्या बक रहा है.. मैंने कमरे के अंदर झाँककर देखा तो वास्तव में लोग किसी के जन्मदिन की तैयारियाँ कर रहे थे,दीवार पर गुब्बारे लगे हुए हैं ,पंखों को सजाया जा रहा है,लाइटिंग की व्यवस्था की जा रही है तभी कोइ कहता भैया इसे बोर्ड में लगा दो मेरा हाथ नहीं पहुँच रहा है मैं उस क्लिप को बोर्ड में लगा देता हूँ,सारा कमरा रोशन हो उठता है और मैं वहाँ से सीधा निकल जाता हूँ,यह स्थान भी मुझे देखा देखा सा लगा पर पहचान में नहीं आया कहाँ का था और यह लौग कौन थे,किन्तु अब जैंसे ही आगे कदम रखा तो यह क्या मेरा बचपन का स्कूल वही बच्चे वही शिक्षक सब कुछ बैंसा का बैंसा    का बैंसा ,बच्चे टाटपट्टी पर बैठे हैं,सरारतें कायम हैं,एक  पाँचवी वालों की कक्षा इमली के नीचे लगी है,जिनके घर में स्कूल लगता था उन्होंने पूरा आँगन लीपा हुआ है गलियारे में कोइ सी फसल सूखने डली है और मैं जाकर  एक तखत पर बिल्कुल चुप चाप बैठ जाता हूँ,पर बुरा जब लगता है कोइ मुझसे बोलता ही नहीं है सबके सब अपने कामों में व्यस्त जैंसे मेरे होने का उन्हें कोई भान ही नहीं,जैंसे मैं होकर भी मौजूद नहीं था| किसी से कोई बात ही नहीं...बस सर्ट की बाँह ऊपर किये ध्यानस्थ मुद्रा में बैठा हुआ हूँ,इतने में किसी ने आकर कहाँ दुर्गेश साढ़े पाँच बज गए शाम होने को है और तुम सो रहे हो,यह सुनते ही मेरे भीतर कुछ चेतना जागी और सटपटा कर उठा शरीर पूरा पसीनें में भीगा हुआ है...और मैं सोच रहा हूँ यह था क्या?

दुर्गेश कुमार सराठे

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