मित्र

आज सुबह जैंसे ही आँख खुलीं तो एक ध्वनि झंकरित हुई,गीत था किशोर कुमार का "रुक जाना नहीं तू कहीं हार के काँटों पे चलके मिलेंगें साये बहार के" दरअसल हमारे मोबाइल की रिंगटोन बज रही थी| एकाएक इतने सुबह कौन हो सकता है,जरूर पिताश्री होंगें,मैंने जल्दी से फोन उठाया..पर यह तो हमारे एक सुदूर मित्र का है| बच गए पिताश्री की फटकार से..नहीं तो हेलो बोलने की जगह"अभी तक सो रहे हो"दिन सर पर चढ़ा जा रहा है..यही प्रवचन सुनकर ईश्वरीय कृपा का अर्जन करना पड़ता| खैर छोड़िए पिता की फटकार हर किसी को नशीब नहीं होती,जब ईश्वर की असीम कृपा होती है तभी पिताश्री की डाँट डपट रूपी आशीर्वाद का प्राप्त हो पाना सम्भव हो पाता है| और आज हम पर पितृ कृपा होते होते रह गई| आगे बताना तो भूल ही गया मित्र से क्या वार्तालाप हुए..जैंसे ही हमने हेलो कहा हमारा मित्र बोला भाई क्या बात है आज कल दोस्तों को बिल्कुल ही भूल बैठे आपतो,प्रतियोत्तर में हमने भी यही प्रश्न उस पर दाग दिया, दोनों के पास कोई जबाव नहीं कौन किसे भूला कहा नहीं जा सकता, पर एक प्रश्न मन में जरूर उठा आखिर जिन्हें हम मित्र कहते नहीं थकते क्या वे वास्तव में मित्र हैं या कुछ और? हमारी उसके साथ बीस मिनिट तक बात चलती रही किन्तु जैंसे ही बार्तालाप बंद हुआ मन में बहुत सारे सवाल उथल पुथल मचाने लगे आखिर मित्र वास्तविकता है या फिर कल्पना मात्र| इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए मैंने अपने समयकोष को खंगाल डाला जिसके गर्त से मित्रता की भांति-भांति की नवीन परिभाषायें हृदयपटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगीं,जिनमें कई मतलबी प्रवृत्ति से ओत प्रोत तो कई बिल्कुल निरंकता से आवरित कई तो केवल नाम मात्र  की ही परिभाषायें थी,जिनमें केवल मैत्री नामक शब्द ही अपनी उपस्थिति का ढोल पीट रहा होता भाव तो प्रायः रिक्तता का प्रदर्शन करता नजर आता| मन की स्थिति ऐसी थी जैंसे बिना पतवार व बिना चालक की नाव जो किनारा ढूंढने के लिए संघर्ष कर रही है| हृदय में उद्भित भावना रूपी लहरें मनः रूपी नाव को बार-बार झकझोर रही हैं| लगता है कि अब इस भंवर से निकलना सायद ही हो,................|

दुर्गेश कुमार सराठे

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