अप्रत्याशित

अप्रत्याशित

कहानी एक पक्षी के दुखद जीवन की

एक दिन सुबह 6 बजे अपने घर के आँगन में प्रातः कालीन सूर्य की लालिमा को निहारे जा रहा था| बिना किसी पूर्वयोजना के...... बस प्रातः काल के अनुपम सौन्दर्य में खोया हुआ था| मुझे अपने स्वयं के होने का एहसास था,और ना ही किसी और के.... बस स्वयं एवं बाहरी अवयवों को भुलाकर प्रकृति के सौन्दर्य में खो जाना चाहता था| लैकिन कुछ समय हुआ और मेरी नजर एक खम्बे पर जा पड़ी,वहाँ मैंने देखा कि एक पक्षी खम्बे के शीर्ष स्थान पर बैठा हुआ है| आज से पहले मैंने इस पक्षी को यहाँ कभी नहीं देखा, मैंने केवल इसे इत्तेफाक समझकर छोड़ दिया सोचा "कहीं से आ गया होगा" और अपने काम में लग गया, लैकिन दूसरे दिन फिर उसे उसी खम्बे पर देखा, और यह क्रम लगातार दस बारह दिन तक चलता रहा| मैं उस पक्षी को प्रतिदिन सुबह उसी खम्बे पर बैठा देखता और चला जाता| लैकिन एक दिन मेरे मन में उस पक्षी के बारे में जानने की जिज्ञासा उपजी, मैंने उस पक्षी के बिषय में अपने कुछ मित्रों को बताया,पर अपने दोस्त भी अपनी तरह बुद्धू, ना... उन्हें कुछ पता और ना मुझे| पर,मैं उसके बारे में जानना चाहता था,और मैंने अब अनुभवी बुजुर्गों की शरण लेनी उचित समझी और उस पक्षी के बारे में बुजुर्गों से से पूछा| तब पता चला कि वह पक्षी सफेद कबूतर है| कबूतरों की बहुत सारी प्रजातियाँ होती हैं, उनमें से वह सफेद प्रजाति का कबूतर है| पर मेरी जिज्ञासा यहीं पर शांत नहीं हुई, बल्कि इसके बाद जिज्ञासाओं का भवंडर उमड़ पड़ा | मैं उस पक्षी के बारे में सबकुछ जान लेना चाहता था,और मैंने इसकी शुरूआत भी कर दी और अपने सारे दोस्तों को इस काम में लगा दिया| अपने सभी मित्रों से कहा कि वे सब इस कबूतर के बारे में जो भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, प्राप्त करें| और अपने मैं अपने काम में लगा ही था| आखिरकार हम लोगों की मेहनत कमयाब भी रही और अपने मित्रों की मदद से उस कबूतर के बारे में सारी जानकारी एकत्र कर ली| दरअसल बात उस समय की है, जब आठवी कक्षा में पढ़ता था | और नवी कक्षा में मेरा दाखिला शासकीय मॉडल हायर सैकैण्डरी स्कूल बाचावानी बनखेड़ी में हो गया था| और इस कारण मैं अपने गाँव से दूर पिपरिया में रहने चला गया था| और तभी हमारे पड़ोसी महोदय दो कबूतर खरीद लाये थे| दोनों कबूतर बहुत छोटे थे जब उन्हें लाया गया था| दोनों रूप रंग में बिल्कुल समान थे, समान पंख, समान आँखें, समान पैर, समान रंग पूरा कायाकल्प ही एकसमान था| दोनों दूध की तरह सफेद ,उन्हें जुलाई माह में लाया गया था| और अप्रैल माह तक वे दोनों काफी बड़े हो गए थे| यहाँ तक सब कुछ बिल्कुल प्रसन्नता पूर्वक चल रहा था| पर समय तो कुछ और ही दिखाना चाहता था, और एक दिन अत्यंत दुखद घटना घटी जिसमें एक कबूतर को अपनी जान गवानी पड़ी| हम इंसानों की गल्ति का मूल्य एक निरपराध पंछी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी| अब केवल एक की कबूतर रह गया| एक कबूतर की मृत्यु के बाद दूसरा कबूतर कुछ अनमना सा रहने लगा, ना कुछ खाता ना कुछ पीता केवल सूना-सूना सा बैठा रहता और हो भी क्यों ना उसने अपने सबसे प्रिय मित्र को जो खोया था|

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा और एक दिन वह पिंजरे से भाग निकला| अब सबने सोचा कि कि यह कबूतर जरूर कबूतरखाने चला जायेगा, क्योंकि कबूतर कभी भी अपने गन्तव्य स्थान को नहीं भूलते| उन्हें दिशाओं का पर्याप्त ज्ञान होता है| किन्तु हुआ कुछ और ही|

वह इस जगह को छोड़कर कहीं नहीं गया बल्कि दिन में बार-बार उस पिंजरे के आस-पास आया-जाया करता, सायद उसे अभी भी आशा थी कि उसका प्रिय दोस्त मिल जाये| वह हमेशा अपने दोस्त को ढूंढने का प्रयास कर रहा था,कभी पिंजरे के पास आ जाता,तो कभी अड़ोस-पड़ोस के घरों में, यहाँ तककि वह पूरे मोहल्ले में घूमता सायद अपने दोस्त को किसी भी तरह पाना चाहता था| पर उसके प्रयासों का उसे कोई मूल्य मिलने से रहा ,पर बेचारा निरंतर अपने अपने दोस्त को ढूंढने का प्रयास करता रहा| निरंतर प्रयास के बाद उसने एक ऐसा स्थान खोज निकाला, जहाँ से वह प्रत्येक घर घर पर अपनी दृष्टि रख सके, और वह स्थान था खम्बे का खम्बे का शीर्ष भाग, यहाँ से वह सबकुछ देख सकता था| जैंसे ही सुबह का सूरज निकलता और वह उस खम्बे पर आकर बैठ जाता| वह दिन-भर उसी खम्बे पर बैठा रहता, उसका यही एक मात्र कार्य था खम्बे पर बैठना और सब पर अपनी नजरें रखना|

और  जून के महीने में मैं भी अपने गाँव ही था| और  अब हमने एक निर्णय लिया कि इसे दाना पानी उपलब्ध कराया जाए, हमने एक बर्तन में दाने और एक बर्तन में पानी लिया और खम्बे पर बाँध दिया| सायद उसे कुछ राहत मिल सके| पर इंसान को अभी भी वह चालाक और धूर्त ही समझता था, यहाँ तक की उसने हमारे द्वारा दिए गए दाने और पानी को स्वीकार करना भी मुनासिब नहीं समझा, और उसे अस्वीकार कर दिया| सायद वह इसे कोई छलावा समझ रहा था, पर दो चार दिनों के बाद वह मुझे जानने पहचानने लगा और दाना पानी खाने पीने लगा, पर वह हमेशा चौकन्ना रहता और हमेशा अपने दोस्त को ढूंढने का प्रयास करता रहता उसकी निगाहें हमेशा अपने दोस्त के लिए प्रतीक्षारत् थीं|

मैं दस पन्द्रह दिनों तक गाँव में रहा, और इस दौरान मैंने उस पक्षी की हर सम्भव मदद करने का प्रयास किया| सुबह शाम उसके दाने और पानी की व्यवस्था कर देता था, अब वह मुझसे भली भाँति चिर-परिचित हो चुका था |और उसके स्वभाव में पहले से बहुत परिवर्तन हो गया था| एक दिन वह अचानक आया और किसी पालतू लेहटे हुए परिंदे की भांति मेरे कंधे पर आकर बैठ गया| मैंने उसे अपने हाथों से पकड़ लिया पर उसने उड़ने की कोशिश तक नहीं की, वह सहज ही मेरे पास बैठा रहा, अब वह मुझे पहले जैंसा संदेह की दृष्टि से नहीं देखता था बल्कि सहज ही मेरे पास आ जाया करता था| उसकी प्रत्येक प्रतिक्रिया उसे अन्य पक्षियों से अलग करती थी, वह अन्य पक्षियों से बिल्कुल ही भिन्न था, उसका क्षणपरीवर्तित स्वभाव, उसकी भिन्नार्थक प्रतिक्रियाएं सबकुछ पूर्णतः भिन्न थीं| और कभी कभी मेरे मन में आता था कि अगर कहीं वह अपनी भाषा समझ सकता तो उसे बता देता कि वह जिसे हरदम ढूंढने का प्रयास कर रहा है वह हमदम उसे अब इस जन्म में मिलना असंभव है|पर उसे कैंसे बतलाया जाता, वेचारा वह तो एक मूक परिंदा है जो अपने दर्द को किसी के साथ साझा भी नहीं कर सकता| वह भले ही पक्षी होने के कारण इंसानी भाषा समझने में असमर्थ है, किन्तु वह भावनाओं को समझने में समर्थ है और भावों को पढ़ना जानता है|और एक दिन सायद वह समझ जाता है कि अब उसकी प्रतीक्षा का कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं होगा, उसकी दो महीने की यह प्रतीक्षा उसे बता देती है कि वह जिस अजीज मित्र को ढूंढ रहा है वह उसे अब नहीं मिल पायेगा, और वह अपने मित्र से मिलने की तड़पन हृदय में संजोय अपने प्राण त्याग देता है| और एक पक्षी के दुखद जीवन की अमिट रेखा का समापन हो जाता है, सायद उसका प्रारब्ध यही था, किन्तु उसकी यह भावुक कर देने वाली व्यथा जरूर सोचने पर विवश कर देती है कि एक पक्षी भी भावुक होता है, उसके हृदय में भी भावनाओं का संचार होता है| वह इंसान से कहीं अधिक स्नेही होता है, और उसका स्नेह इतना अटूट  होता है कि वह उसके अभाव में अपने प्राण तक अर्पण कर देता है| और  दूसरी तरफ हम मानव हैं............. खैर मैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि वह कुछ समवेदनाएं हम मानवों में भी स्थानांतरित कर दें............................ |
दुर्गेश कुमार सराठे

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